Monday, 7 June, 2010

यथार्थ में प्रेम


                        कहा जाता है की प्रेम करना चाहिए पर समझ ये नहीं आता की प्रेम कैसे किया जा सकता है , क्या कोई ऐसी विधि मौजूद है जो हमें प्रेम करना सिखा सके .हर तरफ एक ही बात रटी जाती है की हर किसी से प्रेम करना ही जीवन है , पर क्या कहने वाले खुद  जान पाते  है की आखिर ये प्रेम है क्या . संदेह  तो इसी बात पर हों जाता है की जिस किसी ने प्रेम का नामकरण किया होगा, उसे क्या चीज़  जान पड़ती होगी , आखिर किस को नाम प्रेम दिया गया .
       
                       ये निहायत ही सत्य है की लोग कहीं न कहीं भरम में खोए हुए है , क्योंकि यदि  शायद जिसको प्रेम कहा गया है उसको जान लिया जाता तो सभी के सभी स्वार्थों से परे जा चुके होते. आज की दुनिया तो माता , पिता , बहन , भाई , पत्नी , पति के बीच पाए जाने वाले सहवंध तक ही प्रेम को सीमित रखते है , यदि बात कुछ  बड़े स्तर की हों तो  मुकाबला समाज , जाती , और देश तक चला जाता है . पर इन  सभी में तो अहंकार ज्यादा और प्रेम नदारत दिखाई पड़ता है, कहीं न कहीं हम इसे प्रेम समझ कर अपने से जुडी  हरेक चीज़ को ऊँचा दर्जा देना चाहते है.
   
            
                        ये बड़े ही सोचने की बात है की क्या प्रेम की कोई सीमा भी हों सकती होगी , क्या प्रेम किसी मनुष्य किसी परिवार , किसी जाती , किसी देश तक ही सीमित होगा , नहीं ये नहीं हों सकता . कही न कहीं हमारी परिभाषा ही गलत होगी . ये सब तो बिभाजन है ये प्रेम कैसे हों सकता है , प्रेम तो ब्रह्माण्ड को एक ही रूप में एकत्रित कर देता है , ये तोड़ नहीं सकता . 

                          प्रेम का कोई स्वरुप नहीं ये खुद ही परमात्मा है , इसको कोई नाम नहीं दिया जा सकता , ये किसी भी तरह से भौतिक नहीं हों सकता ,ये किसी भी रिश्ते की बपौती नहीं हों सकता , जो लोग सिर्फ रिश्तों को ही प्रेम मानते है उन्हें ये जान लेना चाहिए की वे सच्चाई से विरोध कर रहे है और वे खुद ही सच से दूर रहना चाहते है .


                        प्रेम किया नहीं जा सकता ये किसी आत्मा की अपनी विशिष्टता होती है .ये सिखाया नहीं जा सकता , पर हाँ प्रकिरती के नजदीक जाकर , झूठ की दुनिया को गहरे से समझ कर उससे छुटकारा पाकर अपने  दृष्टी कोण  को प्रेमी जरुर बनाया जा सकता है ,अर्थात प्रेमी बनकर उन्नत हों जाना संभव है ,क्योंकि प्रेमी का अर्थ है कायनात में पाए  जाने वाले हर एक अस्तित्व से प्रेम की संवेदना के जरिये जुड़ जाना , इस तरह से हर एक प्रेमी श्रेष्ट है , और प्रेम पर किसी भी तरह का पर्दा डालना , रोकना , या प्रताड़ित करना  परमात्मा के साम्राज्य में  अन्याय है .

2 comments:

संगीता पुरी said...

प्रेम करने के लिए कुछ सोंचने की आवश्‍यकता नहीं !!

Divya said...

अपने दृष्टी कोण को प्रेमी जरुर बनाया जा सकता है ,अर्थात प्रेमी बनकर उन्नत हों जाना संभव है ,क्योंकि प्रेमी का अर्थ है कायनात में पाए जाने वाले हर एक अस्तित्व से प्रेम की संवेदना के जरिये जुड़ जाना , इस तरह से हर एक प्रेमी श्रेष्ट है , ..

Bahut sahi likha aapne.

I admire the depth in your writings.