Sunday 7 November 2010

ओह ! तो यहाँ है भगवान्

एक दिन कि बात है -

जब भगवान्  काफी थका हुआ महसूस कर रहे थे  कारण ये था कि वे अब लोगों कि इक्षाओं कि पूर्ति करते-करते परेशान हो गए थे .
फिर एक दिन तंग आ कर उन्होंने कुछ नया करने का सोचा.
वे अपने सलाहकार से बोले -
     "हे सलाहकार जी ! में अब तंग आ गया हूँ ये मानव प्रजाति मुझे परेशान किये हुए है ; कोई मुझे कहीं से बुलाता है तो कोई कहीं से     पूर्व  से आवाज आती है तो कहीं पश्चिम से ,एक ख्वाहिश पूरी कर नहीं पाता कि दूसरी अर्जी आगे आ जाती है,
    में अब अपने आप को भी समय देना चाहता हूँ , तो मैंने सोचा है कि अपना ब्रह्माण्ड काफी बड़ा है उसमे अभी भी बहुत खाली जगह है
जहां मानव कभी नहीं पहुँच सकता तो क्यों न वहीं पर डेरा जमाया जाये."
  
  इस पर से सलाहकर बोले - "नहीं नहीं , ये आप क्या कह रहे है , आप तो जानते ही है कि इंसानों कि महत्वाकांक्षा वहुत प्रबल है  वे अब पृथ्वी के बाहर कदम रख चुके है  और आप कहीं भी चले जाईये वे वहाँ तक कभी न कभी पहुँच ही जायेंगे ,और आप हर जगह ही भीड़ का अनुभव करेंगे."

 तब भगवान बोले -"तो फिर क्या इस समस्या का कोई हल नहीं है "

 सलाहकार बोले -"हल तो है श्रीमान! और बहुत सरल है आप को कुछ और न करके सिर्फ इतना ही करना है  आप अपना निवासस्थान कही और न बना के खुद मानव  के अन्दर ही बना ले , क्योंकि मानव कहीं भी चला जाये वो कभी भी अपने अन्दर झाँकने कि  कोशिश नहीं करना चाहता है  और  इस सारी कायनात में  वही एक इकलौती जगह है जहाँ आप खुश रह पायेंगे  "
        
फिर क्या था भगवान् ने वैसा ही किया, और आपको बड़ा अचम्भा होगा ये जानकर  कि भगवान् तब से लेकर अब तक  वहीँ पर है और बहुत खुश भी है ,वैसे तो वहाँ कोई पहुँचता नहीं और यदि वहुत ही दुर्लभ कोई कभी पहुँच भी जाता है तो भगवान् उसे अपना मित्र बना लेते हैं .

Saturday 21 August 2010

महाविद्यालयों मैं चल रही मनमानी

यह बात सर्वथा सत्य है कि मानवीयता सदैव ही आगे कि ओर अग्रसर रही है,जैसे कि हम प्रारंभिक तौर पर पशु थे फिर निरंतर विकास कि ओर प्रवत्त रहे और अंततः हम इस दौर में है जब कि हम सभ्य कहलाते है .अर्थात निरंतर परिवर्तन होते रहे, यहाँ पर इस बात का विशेष ध्यान रखा जाये कि बात वैचारिक परिवर्तनों कि हो  रही है न किअंधाधुन्द होते शहरीकरण कि .
           परिवर्तन आवश्यक है हम वर्तमान का आंकलन कभी भी पुराने ढंग से नहीं कर सकते,अर्थात समय के साथ साथ हर संस्कृति, हर शैली में परिवर्तन आवश्यक है
           शिक्षा के  क्षेत्र में भी परिवर्तन हुए है जैसे कि आज इस बात पर जोर दिया जाता है कि विद्यार्थी कोई वस्तु नहीं है , उन्हें बंधी बनाकर नहीं सिखाया जा सकता. बात  पूर्णतः सत्य भी है विद्यार्थी पर किसी भी प्रकार का  शारीरिक और मानसिक आघात वर्जनीय होना ही चाहिए. दरअसल इस तरह कि शैली  का निर्माण किया जाना चाहिए जिससे विद्यार्थी स्वतः ही शिक्षा कि  ओर प्रवत्त हो .
           इस सन्दर्भ में आमिर खान निर्मित फिल्मे "तारे जमीं पर " और "थ्री इडियट" काबिले तारीफ है . खासतौर पर "थ्री इडियट"  कि सफलता से उचे ओहदों पर बैठे  शिक्षक  और कार्यकारणी सदस्यों को  शिक्षा लेनी चाहिए , कि आखिर किस तरह के स्नातक तैयार करना उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए .
        ये बात बड़े शर्म की है कि उच्च शिक्षा शैक्षणिक संस्थाओं में जिन्हें शिक्षा का मंदिर कहा जाता है भ्रष्टाचार और अहंकार 
साफ़ नजर आते है . महाविद्यालयों मैं चूँकि शिक्षक विद्यार्थियों पर हाथ नहीं उठा सकते तो उनके पास शोषित करने के कई और तरीके हैं  जैसे किसी को पास या फ़ैल करना भी कुछ प्रतिशत उनके हाथ में है जिसके जरिये वे आसानी से अपने अभिमान को पोषित कर लेते हैं . ये उत्तरदायित्व तो शिक्षक का है कि वह विद्यार्थियों कि मनोदशा समझते हुए कुछ ऐसे क्रियाशील तरीके विकसित करे जिससे कि शिक्षा में आकर्षण पैदा हो सके.
         उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों कि उदासीनता का  कारण  कुछ फीसदी तक  शिक्षकों का अहंकार , उनके अवैज्ञानिक तरीके तथा संकुचित व्यवहार  भी है .हाँ ये बात भी सच है कि कुछ एक विद्यार्थी शिक्षा का केवल  नाम करना चाहते है पर कहीं न कहीं उसका  जिम्मेदार भी सामाजिक ढांचा ही है  और फिर हरेक को एक ही नजरिये से देखना मूर्खता है.
                      ऊँचे स्तर कि शिक्षा में आवश्यक है कि विद्यार्थियों से मित्रवत व्यवहार करते हुए उनकी समस्याओं , उनकी गतिविधियों  से अवगत हो उनको मार्गदर्शन प्रदान किया जाये , डाट -डपट कर, उन्हें भविष्य में आगे न बढने देने कि धोंस देकर मजबूर करना निहायत ही अमानवीय है . 
          एक स्याह पहलु ये भी है कि आखिर ये किस तरह का "वायरस" सारे  भारतीय संस्थानों में व्याप्त है कि जितना बड़ा ओहदा उतना ही गंभीर अहंकार ,आखिर क्यों कर ये दफ्तरशाही व्याप्त है , व्यक्ति आखिर सहज क्यों नहीं है ,थोडा सा पद पाते ही पाँव जमीन पर नहीं टिकते , बोलने का अंदाज़ बदल जाता है ; फिर यही लोग अपने उपर होते भ्रष्टाचार को देख कर रोना रोते है . ये बात लोगों को समझ क्यों नहीं आती कि यदि नींव ही खोखली है तो फिर भवन मजबूत कैसे हो सकता है .
              अंततः यह बात याद रखने योग्य है कि वास्तव में हम इंसान से बढ़कर और कुछ भी नहीं . पद ,प्रतिष्टा,धन  यह सब झूठ है ये सब शांति कर नहीं हो सकते , व्यक्ति को  पूर्णता का भाव तभी प्राप्त हो सकता है जब वह नितांत सहज हो .

Friday 16 July 2010

क्या आप बुद्धिजीवी हैं .....सावधान

 आज दुनियां की  स्थति  देखते हुए एकदम ये विचार आया,कि जो कुछ हो रहा है आखिर ठीक ही तो है,  लोगों में आपस में मतभेद है,अविश्वास है ,हिंसा है तो आखिर गलत क्या हो रहा है .
     क्योंकि लगभग एक बहुत ही कम प्रतिशत है जो लोग प्रेम,अहिंसा को  समझ सकते है और मानसिक रूप से भी स्वस्थ है तथा बुद्धिजीवी है ,बाकि सारा का सारा जन-जत्था  तो लगभग एक ही मानसिक स्थति में जी रहा है बस क्रिया-कलापों में थोडा बहुत अंतर है . 
     कुछ खास बातें जो सभी लोगों कि मानसिक समानता उजागर कर देती है  इस प्रकार है :-
१.  सभी पड़ते है और पढ़ाते रहते है कि बेमानी  पाप है ,पर असल जिंदगी में इस धरती के संसाधनों का जमकर उपयोग करो     और ज्यादा से ज्यादा दौलत पैदा कर प्रतिष्ठा हासिल करो कैसे भी ..
2.  किताबों   में पदों  कि जातिवाद बेकार है पर कहीं ऐसा न हो कि कोई जाती या समाज कि प्रतिष्टा पर सवाल कर सके.
३. हम औरों से श्रेष्ट है  ये बात सनद रहे, क्योंकि हम किसी संस्कृति-विशेष ,देश-विशेष ,धर्म-विशेष से सम्बद्ध है .
४. पूत के पाँव पालने में ही दिखने लगते है सो बचपन से ही, जो भी सिखा सको चाहे वह गलत हो या सही ,सिखा दो,मनोविज्ञान तक बातें जमा दो,क्योंकि बच्चे के बड़े होते ही  उसका तार्किक दिमाग काम करने लगेगा, उसे अभी  नष्ट  कर दो .
५.देश कि जनसंख्या बढाने  में भरपूर सहयोग दो,पर तरीका संस्कृतिक होना चाहिए .
६. प्रेम कि बात तो देखो करो मत ये सब तो किताबों की बातें हैं और सब फिर  संस्कृति के  अनुकूल भी तो नहीं हैं.
      अब इस मनोदशा से ग्रसित व्यक्ति और कर भी क्या सकता है अगर वो  कुंठाग्रस्त न होगा तो क्या  होगा ,मरने मारने के सिवाय और सोच भी क्या सकता है . ये सब नष्ट होने के लक्षण हैं और होना भी चाहिए आखिर ऐसी मानवता और किसी को क्या देने में समर्थ है .लड़ कर इन्हें सुकून मिलता है और साथ साथ मानवता कई सदियों पीछे चली जाती है,जो कि इनके पुरातन होने के प्रमाण भी मुहैया कराती है क्योंकि पीछे के समय में रहना ही इन्हें रास आता है.
        रही बात मुट्ठी भर बुद्दिजीवियों कि तो उनका तो दुर्भाग्य है जो इस दुनियां में आ टपके .उनके लिए तो कोई जगह ही नहीं वो तो किराये पर रहते आ रहे हैं और फिर गेंहूँ के साथ गुण का पिसना तो स्वाभविक सी बात है .

Thursday 10 June 2010

जीवन की सुन्दरता -- उसका अप्रत्याशित स्वरुप


जीवन की सुन्दरता, विशिष्टता का एकमात्र रहस्य है उसकी अप्रत्यासित प्रकृति. जीवन अभोतिक है इसके अंतर्गत समय जैसी कोई अवधारणा नहीं होती ,हर पैमाना मानव निर्मित है कोई भी पल ,छोटे से छोटा  पैमाना अपने आप में विशिष्ट कहा जा सकता है.. जो भी लक्ष्य , मायने , अर्थ आज हम जानते है सब के सब मानव निर्मित है या कहें की सामाजिक है सांसारिक है . इन सभी चीजों का जीवन या जीने की उर्जा से कोई लेना देना नहीं है  

            मेरे अनुसार हमने वेबजह ही जवानी , बुदापे की परिभाषा बना ली है व्यक्ति हमेशा एक ही मानसिक अवस्था में रह सकता है उसे हम बचपन कह सकते है , मनुष्य की आत्मा हमेशा स्वतंत्रता और उत्साह को ही तलाशती रहती है पर ज्यों , ज्यों  उम्र बदती है सामाजिक अहंकार, स्वार्थ ,और प्रभुत्व जैसी  काल्पनिक परिभाषायें बचपन  छीन ले जाती है , तभी तो सारे के सारे बड़े कहते है "बचपन तो बचपन था उसका जबाब नहीं" "बचपन सबसे उत्तम था " यदि बचपन ही सर्वोत्तम है तो इसका मतलब है की  बड़े होकर हम उन्नत होने की बजाय उल्टा गर्त  में गिरते  जाते है , वास्तविकता भी यही है वचपन के साथ मानव अपने सीखने  की प्रबृत्ति खोता चला जाता है ,अर्थात जो जीवन की परिभासा मानी गयी  है वह जीवन न होकर सिर्फ पल पल मौत के करीब जाना है, 
            जीवन का तो अर्थ ही है , आनंदमय रहना सबकुछ समझते हुए ज्यादा से ज्यादा सहज होते जाना , और  उम्र के साथ साथ और आधिक आनंदित और उन्नत होते जाना . यही कारन है की महान लोग कहते है की  किसी के  दुनियां में आने और जाने के से कोई फर्क नहीं पड़ता , यदि फर्क पड़ता है तो उसके जीवन जीने के तरीके से , उसके जीवन के आनंदित पल वहुमुल्य हो जाते हैं . जो औरों को जीवन की अर्थवत्ता  खुद जी कर बता सकता हो वाकई में वही  इंसान है इसी पैमाने पर विचार करते हुए जीवन में घटी एक महत्वपूर्ण घटना याद आई जो आप तक पहुंचा रहा हूँ. 
  
            बात छात्र जीवन की है जब तीसरी कक्षा उत्तीर्ण की थी ,बारिस का समय था छुट्टियाँ चल रही थी, एक दिन खेलने मैदान मे पहुंचे तो देखा की  काफी बारिस हों कर चुकी थी और मैदान गीला था सिर्फ एक मित्र के आलबा कोई और नहीं पहुंचा था . हम दोनों ने चलते चलते दो युवकों की बात पर  ध्यान दिया तो पता चला की पास  ही के गाँव मे जो की १६-१७  किलोमीटर दूर है एक नदी (क्योतन) मे एक ट्रक डूब गया है , मन मे बड़ी जिज्ञासा हुई क्योकि ऐसी दुर्घटनाओं के बारे मे सिर्फ सुना था देखा नहीं था और फिर वह गाँव (उदयपुर )एक  प्राचीन  शिव मंदिर की वजह से भी विख्यात था  जहां हम कभी नहीं गए थे 
              
                                      उदयपुर का मंदिर 

             तो हमने होसला जुटाया और अंदाज लगाया की यदि १ घंटे मे पहुंचे तो २ ढाई घंटे मे तो घर तक वापस पहुँच ही जायेंगे , उस समय ये निर्णय बड़ा साहसिक रहा था क्योकि नयी  सायकिल  घर बालों ने खरीद कर दी थी और  नया-नया चलाना सीखा था , अब तक कभी इतनी लम्बी दूरी भी नहीं चले थे

          फिर क्या था दोनों मित्र एक ही सायकिल पर सवार हो कर चल दिए. जाते समय तो कौतुहल  इतना ज्यादा था की समय का पता भी नहीं लगा और हम चलते चलते नदी तक पहुँच गए. वहां पहुँच कर देखा की सब कुछ सामान्य था और ट्रक तो कब का निकाला जा चुका  था,  हतासा हाथ  लगी फिर सोचा की क्यों न यहाँ तक आये है तो  वह प्राचीन मंदिर भी देख लिया जाये ,उस समय बचपन मे चित्रकथा ,और धारवाहिकों के चलते पुराने मंदिरों, किलो, खंड-हरों  का मनोविज्ञान पर अजीव सा असर था ,हमने निर्णय लिया और हम मंदिर की तरफ चल दिए . सारा शरीर थक चुका था पर जिज्ञासा के सामने ये बात पता  ही नहीं रही .
      मंदिर पहुँच कर कुछ ऐसा महसूस हुआ की जैसे कोई खज़ाना हाथ लग गया हो, उत्साहित मन सब के सब द्रश्यों को याद कर लेना चाहता था , फिर एक महाशय से समय पुछा तो होश खो गए ,दिमाग में बैठा परिवार का डर निकल कर सामने आ गया और साथ  ही साथ थकान  भी रंग दिखाने  लगी , लौटना शुरू किया तो पैर जबाब देने लगे ,हर पांच मिनिट में हम बदल बदल कर सायकल चलाते ,समय जैसे थम सा गया था , जैसे तैसे डरते डरते ,थके हुए हम घर बापस आये ,घर वालों  का गुस्सा एक साथ निकल पड़ा क्योंकि अब तक पांच घंटे हो चुके थे . काफी खरी-खोटी सुनने के बाद हम खाना खाकर सो गए , पर सारी की सारी यात्रा जैसे मनोविज्ञानं  में गहरे तक उतर चुकी थी, आज भी जब  वो यात्रा याद आती है तो  बही थकान , वाही उत्साह , वही डर ,वही साहस महसूस किया जा सकता है.
          शुरुआत के उस दो घंटे के सफ़र को जिस गति से उत्साह पूर्वक तय किया था यदि उसी उत्साह उसी कौतुहल के साथ अगर जिंदगी को जिया जाये ,तो जिंदगी आज भी उतनी ही हसीन है ,वही  आनंद हम आजीवन महसूस कर सकते है. यही जीवन का लक्ष्य भी है की निडर निर्भीकता और उत्साह से इसे जिया जाये, इसके पल पल का आनंद उठाया जाये . 
          

Monday 7 June 2010

यथार्थ में प्रेम


                        कहा जाता है की प्रेम करना चाहिए पर समझ ये नहीं आता की प्रेम कैसे किया जा सकता है , क्या कोई ऐसी विधि मौजूद है जो हमें प्रेम करना सिखा सके .हर तरफ एक ही बात रटी जाती है की हर किसी से प्रेम करना ही जीवन है , पर क्या कहने वाले खुद  जान पाते  है की आखिर ये प्रेम है क्या . संदेह  तो इसी बात पर हों जाता है की जिस किसी ने प्रेम का नामकरण किया होगा, उसे क्या चीज़  जान पड़ती होगी , आखिर किस को नाम प्रेम दिया गया .
       
                       ये निहायत ही सत्य है की लोग कहीं न कहीं भरम में खोए हुए है , क्योंकि यदि  शायद जिसको प्रेम कहा गया है उसको जान लिया जाता तो सभी के सभी स्वार्थों से परे जा चुके होते. आज की दुनिया तो माता , पिता , बहन , भाई , पत्नी , पति के बीच पाए जाने वाले सहवंध तक ही प्रेम को सीमित रखते है , यदि बात कुछ  बड़े स्तर की हों तो  मुकाबला समाज , जाती , और देश तक चला जाता है . पर इन  सभी में तो अहंकार ज्यादा और प्रेम नदारत दिखाई पड़ता है, कहीं न कहीं हम इसे प्रेम समझ कर अपने से जुडी  हरेक चीज़ को ऊँचा दर्जा देना चाहते है.
   
            
                        ये बड़े ही सोचने की बात है की क्या प्रेम की कोई सीमा भी हों सकती होगी , क्या प्रेम किसी मनुष्य किसी परिवार , किसी जाती , किसी देश तक ही सीमित होगा , नहीं ये नहीं हों सकता . कही न कहीं हमारी परिभाषा ही गलत होगी . ये सब तो बिभाजन है ये प्रेम कैसे हों सकता है , प्रेम तो ब्रह्माण्ड को एक ही रूप में एकत्रित कर देता है , ये तोड़ नहीं सकता . 

                          प्रेम का कोई स्वरुप नहीं ये खुद ही परमात्मा है , इसको कोई नाम नहीं दिया जा सकता , ये किसी भी तरह से भौतिक नहीं हों सकता ,ये किसी भी रिश्ते की बपौती नहीं हों सकता , जो लोग सिर्फ रिश्तों को ही प्रेम मानते है उन्हें ये जान लेना चाहिए की वे सच्चाई से विरोध कर रहे है और वे खुद ही सच से दूर रहना चाहते है .


                        प्रेम किया नहीं जा सकता ये किसी आत्मा की अपनी विशिष्टता होती है .ये सिखाया नहीं जा सकता , पर हाँ प्रकिरती के नजदीक जाकर , झूठ की दुनिया को गहरे से समझ कर उससे छुटकारा पाकर अपने  दृष्टी कोण  को प्रेमी जरुर बनाया जा सकता है ,अर्थात प्रेमी बनकर उन्नत हों जाना संभव है ,क्योंकि प्रेमी का अर्थ है कायनात में पाए  जाने वाले हर एक अस्तित्व से प्रेम की संवेदना के जरिये जुड़ जाना , इस तरह से हर एक प्रेमी श्रेष्ट है , और प्रेम पर किसी भी तरह का पर्दा डालना , रोकना , या प्रताड़ित करना  परमात्मा के साम्राज्य में  अन्याय है .

Friday 16 April 2010

प्रेम से ही अस्तित्व है

   हम सभी शायद प्रेम को परिभाषित करने की नाकाम कोशिशे करते आये है, वैसे तो में भी एक निर्दोष सी कोशिश कर रहा हूँ पर कारन सिर्फ यही है की में खोज में हूँ और जो अब तक पता लगा है वो ये है की प्रेम एक ऐसा अनुभव है जो की खोजी को ही प्राप्त हो सकता है सिर्फ खोज में बने रहना ही प्रेम को पाने का एक मात्र जरिया है .

     प्रेम अस्तित्व है ये सारा विस्तार सिर्फ प्रेम का ही विस्तार है, क्योकि गहरे अर्थों में कहे तो ये ही कह सकते है की  जब प्रेम अपनी सारी सीमाए तोड़कर ब्रमांड में विस्तृत हो जाता है तो वह परमात्मा हो जाता है यही परमात्मा फिर सारी कायनात का रचियता हो कर सामने दिखाई पड़ता है.

    ओशो कहते है की परमात्मा कहीं और नहीं है ये हमारे अपने अंदर मौजूद है पर सिर्फ इसे समझ पाना ही इसे पाना है , परमात्मा एक गहरा अनुभव है जो इस भौतिक देह में अभोतिक को समझने का नाम है.

    परमात्मा अद्द्वत की वह स्तिथि है जब आप है तो परमात्मा मौजूद नहीं हो सकता; और जब परमात्मा होगा तो आप मौजूद नहीं हो सकते .

   सीधे शब्दों में कहें तो यही सत्य हो सकता है की परमात्मा प्रेम का ही विस्तार है, अब सबाल ये   है  की हमने दुनियां इस  तरह की बना ली है जिसमे प्रेम शब्द का तो वेझिजक इस्तेमाल किया जाता है पर पर प्रेम कहीं दिखाई नहीं पड़ता बात तो कृष्ण की ही की जाती है पर वर्तमान में राधा के वजूद पर अब भी शक किया जाता है.
  हाल ही के मामले में हरियाणा में एक प्रेमी युगल को मौत के घाट उतार दिया जाता है और नाम में धर्म का, संस्क्रति का सहारा लिया जाता है .

 हम यदि परमात्मा को पाने के लिए जब अंतर्मन में झाकने में असमर्थ पाते है तो उसी परमात्मा के नाम पर बहुत से मंदिर मस्जिदों का निर्माण कर अपने आप को महान कहकर अपने अहंकार की भूख मिटा लेते है.

प्रेम अपने सभी अर्थों में , सभी स्वरुप में विशिष्ट है जब तक इस दुनिया में इसका    पूर्ण रूप से अंगीकार  नहीं होता परमात्मा , दया , करुना , धर्म आदि की बात करना पाखंड से ज्यादा कुछ नहीं क्योंकि सिर्फ प्रेम ही परमात्मा तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता है , माना चाहे कुछ भी जाये सिर्फ प्रेम का एक ही प्रकार होता है स्वरुप चाहे जो भी हो.

Friday 2 April 2010

श्याम से कहो - पैसा कमाए

श्याम से कहो - पैसा कमाए मुरली तो बाद मे भी बजायी जा सकती है 
प्रातः काल का समय, नीला आकाश और कही दूर नदी किनारे के पास से आती हुई सुरीली बांसुरी की लय ,इस बासुरी की लय पर तो मानो सब की सब प्रकृति नाच उठी हो ,फिर इस मानब हृरदय मे तो झंकार बज ही उठेगी ,इस बासुरी की तान पर तो राधा सुध-बुध खो देती है और गोपीयों को जीवन जीने की उर्जा मिल जाती है ; पूरा बाताबरण जैसे आनंदित हो गया हो जिस प्रकार जीवन तथा उसे जीने बालों मे ताल-मेल बन गया हो
पर २१वि सदी मैं तो ये सब बे सरपैर की बातें है क्योंकि अब तो बासुरी का अस्तित्व संकट मैं है, श्याम का मन उब गया है और राधा को भी ये सब कहाँ सुहाता है श्याम को उनके पिता ने अर्थ की अनंत भूख का शिकार बना दिया और राधा अब किसी महेंगे चार पहिया बाहन को महत्व देने लगी है प्रेम तो इस सदी मे कहाबत से ज्यादा कुछ रहा नही , हर जगह जरूरतें मुहबाये खड़ी है सदी मे प्रेम के अनेक प्रकार है और समय भी सुनिश्चित केर दिया गया है, और तो और सभी ने श्याम और राधा को इस बार वन्धन मे वान्धने का निर्णय भी केर लिया है ताकि अब कही श्याम और राधा को मिलने यमुना किनारे न जाना पड़े
राधा ने भी ये प्रण करलिया है की राधा अब श्याम की तभी होगी जब श्याम के पास एक बंगला, एक वाहन हो ,साथ ही श्याम ने किसी अच्छे महाविद्यालय से अर्थ- ब्यबस्था की पढ़ाई कर ली हो, रहा मुरली का सवाल तो वो छोटे बच्चो को दंड देने के काम आ ही जायगी
सच यह है, की मुरली का अस्तित्व तो खो गया है पर साथ ही साथ प्रेम भी चला गया ,जो जीवन का लक्ष्य होना चाहिए और यह बात गौर करने की है की हमने युवा मे जो पैसे की भूख भर दी है बह कभी ख़तम नही होने वाली और युवा को मानवीय संवेदनाओ से दूर करती जा रही है

जीवन...... या जानी-समझी बेहोशी .

   हृदय में अजीब सी  खिन्नता नजर आती है,ऐसा नहीं है कि आसपास व्यस्तता का अभाव हो ,बात तो यही है ये व्यस्तता आखिर चाह क्या रही है. शांत भाव से यदि अवलोकन किया जाये तो हम पते है , कि कोई कथनी में मगन है तो कई करनी में ......... लक्ष्यों कि भरमार है, जिन पर लक्ष्यों का अभाव है उन पर तो और ज्यादा व्यस्तता मुह बाये खड़ी है.
       
     पर ये सब हो क्या रहा है ,और ये सब क्यों हो रहा है मकसद सबके एक ही समान है जैसे -किसी को अपना सर ऊँचा करना है तो किसी के माँ बाप के अरमान अधर में लटक रहे है, किसी की जेब  है कि भरने का नाम ही नहीं लेती, किसी को आये दिन समस्या खड़े रहती है आदि - आदि .
   
   बचपन से अब तक कई परिवर्तन देखने को मिले ,लेकिन सिवाय देखने के कुछ समझ नहीं आया कि ये परिवर्तन आखिर हुए क्यों. वैसे दुनियादारी कि भाषा में तो कई तर्क दिए जा सकते है, क्योंकि यहाँ पर आसन शब्दों द्वारा कठिन से कठिन कहे जाने बाले सरल से सरल सवालों के जटिल से जटिल जबाब बना लिए गए है.
     
    दुनिया विकास कर रही है और विकास की ही बात की जा रही है, पर ये विकास कैसा है बही ऊँची-ऊँची इमारतें,बही उच्च छमता बाले राजमार्ग , जिन्हें देखकर खुद के छोटेपन को बड़ा किया जा सके . सब कुछ हमारे ही आनुरूप.  

    पेट  का पानी हिलना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है , ये तो अब एक विचार का रूप बन गया है, शरीर  को   आराम देना जरुरत के साथ साथ मापन पद्धति भी बनकर उभरी है. क्योंकि ज्यादा शान-शोलत ज्यादा आराम-दायक वस्तुओं कि वहुलता प्रभुत्त्व निर्माण कि ईंटें  है.

     एक दिशा और भी है , जहां भौतिकवाद  और कर्मकांडवाद को मिला कर या विकास और पुरानेपन का घोल बना कर चेहरे पोतने का सतत प्रयास जारी है, ये सदियों से चली आई परम्परा आखिर करती क्या आई है , वही सामूहिक और राजनैतिक तलों पर अंधाधुन्द पनपते भौतिकवाद  को अपना आशीर्वाद देती चली आई है. कही गयी बातों को को सिद्दान्त कहा गया फिर उन्हें अपने अनुरूप तोड़ मोड़ कर नए नए प्रकार के आडम्बरों को जन्म दिया गया . 

   बोरियत के पलों में खाली वैठे हो तो इस कर्मकांडी शांति का सहारा  लेकर पराकास्ठा के अभिमान को नहलाया जाता है ,और भविष्य में ज्यादा सुख - समृधि , रूपया पैसा ,सम्पदा कि गारंटी दी जाती है.
  
   भौतिकवाद को नजर न लग जाये इसलिए जरुरी है कि सभी मिलकर रहें पर स्थानीय स्तर तक , और फिर स्वरक्षा कहकर अपने अन्दर छुपी हिंसा को निकालना  तो भार्मिक कृत्य है.

  इन सभी क्रिया- कलापों में व्यक्ति तो अपने आप को बनाये रखने के लिए जरुरी उर्जा  प्राप्त कर लेता है ,पर मुसीबत तो है गवार. अनपद , नासमझ पशु-पक्षियों की ,पेड़- पौधों की . आखिर ये सब प्रकृति प्रदत्त  संसाधन ही तो है, जो मनुष्य के लिए उपयोगी वस्तुओं से ज्यादा और कुछ नहीं...और हो भी कैसे सकते है जब इंसान को अपने सामने खड़ा इंसान मशीन से ज्यादा और कुछ नहीं रहा, तो इन संसाधनों की क्या कीमत .
   
  शायद हम ये भूल रहे है , की हमारी वनाई हुई दुनिया हमें आराम तो दे सकती है पर ख़ुशी नहीं ,और कहीं न कहीं प्रक्रति से जोड़ने बाले तार ही हमारे बेचैन दिल में झंकार उठा सकते है . क्योंकि ये भूली हुई चेतना भी उसी प्रक्रति का अंग है .


जीवन जीना है तो शराब-ऐ-हँसी पीना है

आज जब हम बहुत व्यस्त है ,तो रोजाना की दौड़-धूप में जीवन को जीना ही भूल जाते है. चेहरों की हंसी अजनबी हो जाती है तो इसी रोज की दौड़-धूप से ही कुछ हंसी के पलों को चुराने की कोशिश है,कुछ इस तरह --

एक बस पकड़ रहा है,और एक सर क्योकि स्कूटर पंचर हो गया है और अब दफ्तर जाने में देर हो रही है; रिक्शे का पहिया टेढा हो गया है,बच्चे ज्यदा भर ,लिए अब उन्हें स्कूल जाने में देर हो रही है

यहाँ मैडम के बाल धुल रहे है उधर महाशय भूखे मर रहे है, महाशय को कोर्ट जाना है और मैडम को बुटीक दोनों को देर हो रही है , एक महिला देखो नोट झटक रही है तो दूसरी की नौकरी अधर में लटक रही है,जल्दी करो भाई कहीं देर न हो जाये

भाई साहब रात भर से जग रहे है,एक बेचारे बेवजह ही भग रहे है;अब क्या करें गार्ड की नौकरी और नाईट शिफ्ट ;दूसरे की ट्रेन छूट रही है मगर बाथरूम का पाइप चोक हो गया है तो कम से कम कमरे के चक्कर तो लगाये ही जा सकते है

एक का पेंट जाली हो गया तो दूसरे का खोपडा खाली हो गया ,बहुत दिनों से कपडे बनबाने का ध्यान ही नहीं रहा पीछे से पेंट छन गया,दूसरे की सुबह सुबह पोहेबाले से बहस हो गयी ,अरे अगर पैसे ले रहा है तो कम से कम प्याज़ तो डाल दिया कर

घर में जाले लटक रहे है,भैया जी चड्डे में मटक रहे है ओफ्फो यह बैंक एक्जीक्यूटिव की नौकरी सुबह से मुह मत धो ,भाई साहब को फ़ोन आ गया पहले प्लान समझाना पड़ेगा

बच्चो को स्कूल की भड-भडी है ,मैडम को पेट की पड़ी है ,सर्दी का ये समय आँखे खुली नहीं ठीक से और स्कूल-बस हार्न दे रही है ,वहां मैडम को बदहजमी हो गयी और तो और हेड-ऑफिस में कोई और घुसा है अब ये देर तो कीमती साबित हो सकती है

बस बाले का पट्रोल जल रहा है ड्राईवर खेनी मल रहा है भाई साहब के बच्चे पता नही क्या पट्रोल के दाम आसमान छु रहे है अबे खेनी तो कभी भी ठूंस सकता है

यहाँ मरने-मारने की सम्भावना बढ़ी है तुझे पीने की पड़ी है ,आपस में ठेकेदार लड़ रहे है की दारू कोंन बेचेगा,और नौजवान बिना पिए रह नहीं सकता "अरे पहले बाटली तो दे दो फिर लड़ लेना "

एक की जेब खाली हो गयी ,दूसरे की देखते ही हालत माली हो गयी ,अरे गुरु अब तो पैसा दे दो तीन साल हो गए आज तो जेब में इतना भी नहीं की सिगरेट पी लूं ,जबाब में " अरे भैया यहाँ तो जहर खाने के भी पैसे नहीं है " तीन साल से बस हवा खाके ही तो जिन्दा था वेचारा

इधर बिना धुले कपडे लटक गए वहां साहब रास्ता भटक गए , मैडम का सहेलियों में गप्पें हांकने का समय हो गया था तो बस कपडे खगाल-खगाल कर लटका दिए सूखने के लिए,वहां साहब को सब्र न था की ट्रेन कब तक जायगी कब फाटक खुलेंगे तो साहब पटरी पकडे-पकडे जाने कहाँ निकल गए सोचा था कहीं से कट लेंगे और जल्दी से जल्दी दुकान खोल लेंगे

पुलिस ने निर्दोष को धर दबोंचा ,मंत्री भिखारी के घर पहुंचा, अगर तीन दिनों के अंदर -अंदर लुटेरों का पता नहीं लगता तो पुलिस की नौकरी जा सकती है,चलो एक निर्दोष को ही बंद कर दिया ,कुछ नहीं से तो कुछ भला ;उधर आज मत्री साहब वोट मांगते-मांगते भिखारी के घर भी जा पहुंचे ,अब जरा आप ही बताइए भिखारी कौन.


मेरी कौन सुनता है

 मरने से पहले एक रपट मे:

नाम :- जो पसंद हो
उम्र :- नब्बे साल मानवीय गड़ना के अनुसार
कार्य :- जीवन को पालना-पोसना
अनुभव :- लगभग जीवन भर
शिकायत का संपूर्ण विवरण (अपनी जुवानी ) :- साहब वैसे तो मैं आपसे कहीं ज्यादा बुजुर्ग हूँ ,मगर चूँकि आप सरकारी अफसर है , तो मुझे साहब ही कहना पड़ेगा

बात कुछ इस तरह है जब मैं नवजात था ,तब मेरा भी एक परिवार हुआ करता था बड़े खुशहाल थे सब के सब ,खाने पीनेकी कोई कमी न थी अचानक एक दिन घोड़ागाड़ी आई कुछ लोग उतरे कुछ खुसुर-पुसुर की और लौट गए

कुछ दिन बाद बे सब के सब आए मैंने देखा ,सभी हथियारों से लेस थे और उन्होंने आते ही हम पर हथियार बरसाने शुरू कर दिए ,सभी स्वजन कुछ ही देर मे ढेर हो गए कमबख्तों लाशों को भी अपने साथ ले गए , मै बेचारा डरा सहमा एक बीमार बुजुर्ग के पीछे छिप कर सब देखता रहा

फिर तो जैसे सारी की सारी दुनिया बीरान सी लगने लगी ,कोई सहारा नही बचा था, पर फिर भी मै तन्हाई को गले लगाकर जीता रहा धीरे -धीरे मेरे दुश्मनों ने मेरे ही आसपास रहना शुरू कर दिया

कहते है बक्त हर घाव को भर देता है ,मैंने सबके साथ दोस्ताना सम्बन्ध बनाने शुरू कर दिए, उनकी भी मेरे साथ घनिष्टता बदती गई ,उनके बच्चे मेरे साथ खेलने लगे और मैं भी उन्हें तरह तरह के तोहफे देता गया , मानों मुझमें नई जीवन तरग उठने लगी लोग मेरे पास बैठ करअपने आपसी झगडे भी निपटा लेते थे ऐसा लगने लगा था मानों मुझे एक बुजुर्ग का दर्जा मिल गया हो

तभी अचानक जैसे समय ने करवट ली हालाकि मेरे पास लोग काफी तादाद मे रहने लगे थे ,पर सन्नाटा छाया रहने लगा , बच्चों ने मेरे साथ खेलना बंद कर दिया ,सब अपने अपने कामों मैं लग गए बस कभी कभी कुछ लोग मेरे पास पूजा पात करने आते थे

एक दिन मैंने सुना की कुछ लोग मुझे मर डालने की योजना बना रहे थे तभी मुझे समझ आया की लोग मेरी नही बरन मेरे पास पड़े एक पत्थर की पूजा करने आते थे अब बे लोग उस पत्थर को धूप और पानी से बचाने के लिए एक छत बनाना चाहते हैं और इसीलिए बे मुझे मर डालना चाहते हैं
मैं चूँकि आपके साथ बचपन मैं खेलता कूदता था ,सो आपको रपट लिखा दी पर मुझे मालूम है की आप भी कुछ नही करेंगे , "क्योंकि मेरी कौन सुनता है"

शिकायत करने बाला
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एक बुजुर्ग पेड़

मानवता का बलात्कार या संस्कृति की रक्षा .

भाई बात कुछ इस तरह है की बहुत दिन हो गए जमाना अपनी रफ्तार में आगे बढा जा रहा है और हम हैं की लाइफ में कोई ट्विस्ट ही नहीं। ॥ कोई काम भी नहीं है और अन्दर दिल में बैठी कुंठित उर्जा जवानी में कुछ कर गुजरने के लिए कह रही है,कोई मुद्दा भी नहीं मिला की तोड़ फोड़ की जाये और लोगों की नजरों में आने का मौका मिले.

ये मनोदशा है,कुछ ऐसे युवाओं की जिनके समक्ष तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर संस्कृति रक्षा जैसे कार्यों में लगा दिया जाता है ताकी वे सोचें की हिंसा फैला कर वे अपना उद्धार कर रहे है.

जरूरी नहीं धर्म कौन सा है ,आतंकवाद हो या दंगा शब्द अलग पर बात एक ...कुल मिला कर हिंसा ,चाहिए क्या ...बस खून-खराबा, नहीं मालूम की कारण क्या है, अब कारणों का क्या वो तो नेताजी बता ही देंगे.

देश आतंकवाद से बुरी तरह जूझ रहा है, और आतंकवाद ही क्यों कई और भी जैसे नक्सलवाद।
समाधान को लेकर सब परेशान है, मगर समाधान हो भी तो कैसे... कौन है यहाँ पर सही... लोग मालूम ही नहीं करना चाहते की वे खुद ही इन सब समस्याओं का कारण है, आखिर मूल है क्या वही धर्म,वही जातिवाद जिसे लोग सीने से लगाये बैठे है, जबरदस्ती ही हम खुद को जंजीरों में जकडे हुए है,और आने बाले युवा को व्यर्थ ही प्राचीनता की तरफ धकेल कर अपने जैसा बना लेते है

गलती उस युवा की नहीं जो हिंसा में लिप्त है... गलत है धार्मिकता के नाजुक से परदे में छिपा कट्टरवाद ,हर बच्चा ये सीखता है, की उसका धर्म गलत नहीं है ...गलत तो और धर्मों के लोग है. बस यही एक मात्र कारण है.

हिंदुस्तान .... धर्म निरपेक्ष पर कैसे कहूं इसे धर्म निरपेक्ष। यहाँ किसी को आतंकबादी का दर्जा दिया जाता है तो किसी को नक्सलवादी होने का......... सच है की किसी का खून बहाना एक निम्नतम दर्जे का कार्य है

एक और भी है जो हिंसा फैलाने पर देशभक्त की उपाधि पाते है ,ये कुछ मुट्ठीभर हिंदूवादी संगठन के कुछ गुंडा तत्त्व जो हिन्दुवाद , रामराज्य के नाम पर खून-खराबा करते है ये वही लोग हुआ करते है जो लड़कियों से बदतमीजी करने के लिए जाने जाते है और वैलेंटाइन-डे पर भारतीयता की दुहाई देकर औरों की स्वतंत्रता पर नाग की तरह फुफकारते है ।

ये वही लोग हुआ करते है, जो ८४ के दंगों में पंजाबियों को मारकर मनोरंजन करते है,फिर इनकी हाई कमान उसे देश भक्ति का जामा पहना देती है, ये वही लोग हुआ करते है जो हाल ही में हुए दक्क्षिण के दंगों में कई ननों का सार्वजानिक रूप से बलात्कार करते है ,फिर उन्हें जिन्दा जला देते तब शर्म नहीं आती पर समलैंगिकता को लेकर ये शर्मिंदगी महसूस करते है।

मंदिर के नाम पर कई जानें ले ली जाती है और चर्च जलाने में आतिशबाजी का मजा लूटा जाता है ,
अब ऐसा क्यों न हो इन लोगो को राजनितिक संरक्षण जो प्राप्त है

ये कुछ गुंडा तत्त्व फिर एक बढ़ी समस्या को जन्म देते है जो क्षेत्रवाद, आतंकवाद , नक्सलवाद के रूप में सामने आती है ।

अगर समस्या का समाधान चाहिये तो पहले गांधीवाद को समझिये,। तलबार हटाना चाहते है तो आपसी रिश्ते बनाना सीखिए अगर हिन्दू के घर मुस्लमान और मुस्लमान के घर हिन्दू होगा तो हथियार उठाना आसन न होगा . देश को आरती और नमाज की जरुरत नहीं है बल्कि जरुरत है " वसुधैव कुटुम्बकम" को अपने जीवन में उतारने की .
बच्चों को उपनाम के फेर से दूर कर दीजिये वे खुद ही अपना नाम बना लेंगे .

अस्तित्व का अंत कोंन होगा जिम्मेदार !

जीवन ........
बड़ा रहस्यमयी ,बड़ा रोचक सबाल है
जीवन का विकाश किस-किस तरह से होता आया , प्रकिरिती अपने अंदर क्या क्या समेटे हुआ है ,ये सब जान पाना तो एक अंत हीन यात्रा होगी यह सच है की मानव जिस तरह से विकसित हुआ है वह जिस तरह से अपना संरक्षण करता आया है ,कबीले तारीफ है
परअपने आप को बिकसित करते करते हम आज इस सीमा पर आ गए की औरों का अस्तित्व हमारे आसरे का मोहताज हो गया ,मतलब ये आज के समय जो भी प्राणी मानव को आर्थिक सेवायें देता रहेगा जीवन के लिए अधिकारी होगा
जरा सोचें क्या येही न्याय है हमनें अपने विकाश क्रम मैं कई सभ्यताओं ,कई धर्मो, कई व्यवस्थाओं को जनम दिया ,अगर देखा जाए तो कही पर भी गुथियों के सही न्यायिक जबाब मौजूद नही है हमने जब चाहा जैसे चाहा वैसे सबाल खडे किए फिर अपने ही तरह से उनके जबाब दिए, सही हों या ग़लत फर्क नही पड़ता
हमेशा सत्य को नाकारा गया आज रोज कही एक न एक अस्तित्व ख़त्म होने की कगार पर है ,अगर भारत को ले लिया जाए तो एक ज्वलंत उदाहरण हमारा रास्ट्रीय पशु बाघ मरने के लिए समझ लीजिये आतुर है ,और कारन सिर्फ़ इंसानी मांग इंसानी लोलुप्सा अब अगर सभी से पूछे तो बताईये क्या सभी धर्म ,सभी समाजें केवल इंसान को ही जीवित रखना चाहती है किसी और को जीने का कोई हक नही
जो कहीं पूजनीय बताया जाता है किसी न किसी रूप से वह मानव के लिए उपयोग का भी बताया जाता है,
स्वार्थ हर जगह प्रवल है जंगली जीवन अब दम तोड़ चला है ,हमने अन्धादुन्ध उत्पीडन किया है हर चीज आज पैसे से तौली जाती है , सतरंज की विसात है और बाकि सब मोहरे है
सत्य तो यही है सबका अस्तित्व सबकी स्वतंत्रता
पर इसकी चिंता किसे है आज जो भी असंतुलन हो रहा है कारन सिर्फ़ इंसान की भूख है
देखना तो यह है की कब तक इंसान निद्रा में डूबा रहेगा कब तक हम अपने को फैलाते जायेंगे और कब तक दूसरों को संकुचित करते जायेंगे,कहीं ऐसा न हो जाए यह धरती रूपी माँ इसके अस्तित्व को ख़तम करने बालों के अस्तित्व की दुसमन बन जाए और हमारी आने बाली निर्दोष पीडी इस काल का ग्रास बन जाए