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Saturday, 28 May 2011

क्या भ्रष्टाचार का सरोकार सरकार से ही है

एक सुबह जब यात्रा करते वक्त देखा की टी. सी. महोदय एक महिला से दंड-शुल्क वसूल कर रहे थे,कुसूर ये था की उस महिला ने सामान्य टिकट लेकर आरक्षित बोगी में कदम रख दिया था ,ठीक है कोई बात नहीं | उस स्टेशन से कई और लोग भी थे जो की बिना टिकट  यात्रा कर रहे थे , एक और युवक से पूछा गया तो पता चला की टिकट ही नहीं है और ये तो भारत देश में नयी बात नहीं  आखिर गरीबी तो गरीबी ही है ,लेकिन उस युवक को पास के ही स्टेशन पर उतरना था तो टी.सी. महोदय उसे साइड में ले गए और फिर क्या था, टिकट के बदले टिकट से भी कम कीमत में दोनों का सौदा तय हो गया, टी.सी. भी खुश और वह युवक भी खुश|
               ऐसे कई वाक्ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से होकर गुजरते है और तो और खुद हमारे ही अथक प्रयासों से चलायमान भी है पर इस तरह का भ्रष्टाचार तो हमारे समाज में और देश में जायज  है ,अपने काम को सही समय पपर पूरा कराने को दी जा रही छोटी भेंट तो लाजमी है, कोई भी (सिवाय कुछ अपवादों के जो की सामाजिक नहीं माने  जाते ) इस तरह के भ्रष्टाचार के विरोध में दिखाई नहीं पड़ता यहाँ तक की इसे भ्रष्टाचार कहा ही नहीं जाता | और हो भी कैसे समाज में हो  रही "रेस" के चलते इतना समय किसके पास है |
               हर तरफ भ्रष्टाचार है और ये करता कौन है खुद "जनता", पद की गरिमा के हिसाब से भेंट जायज भी है और मान्य भी | पर यही भ्रष्टाचार यदि करोड़ों में हो जाये तो फिर चिंता का विषय मालूम होता है| आखिर मामला इतनी बड़ी रकम का है जिसका यदि एक हिस्सा ही हमें मिल जाये तो फिर क्या पूछने काम ही बन जाये ,और रेस में इतनी जल्दी आगे कैसे निकल सकता है कोई, हम तो अभी वहीँ के वहीं रह गए ,ये तो भई खेल-खेल में बेमानी की बात हुई | 
               यदि कोई आवाज उठाना भी चाहे तो माँ कहती है - की आखिर जान खतरे में डालने का क्या फायदा और भी तो लोग है जो अपना काम चला रहे है बस बैसे ही आगे बढते रहो | बात सही तो नहीं कही जा सकती पर जायज जरुर है क्योंकि इस समाज में तो आलोचना करना ही दुश्मनी माना जाता है फिर तो बात गलत के खिलाफ आवाज उठाने की है | ये जान गवा देने के भय से ईमानदार भी बैमानी करने पर मजबूर हो जाते है और यही भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य भी है फिर किस देश और किस समाज पर गर्व करने की विद्यालयों में शिक्षा दी जाती है क्या इसी तरह की संस्कृति पर हम सदियों से गर्व करते चले आ रहे हैं जिसकी किताबों में तो बहुत मान्यताओं की बात की जाती है  पर असल जिंदगी में समाज की हालत कुछ और ही बयां करती है|
                    सरकारों पर तो जनता बड़ी जल्दी रौस प्रकट कर देती है कभी खुद की गिरहबान में झांककर देखने की तो हिम्मत ही नहीं कर पाती | फिर आखिर ये सरकार कौन है , ये नेता कौन है , ये सभी इसी जनता के बीच से ही निकलते हैं , और सभी बहुत अच्छी तरह से जानते है की नेता प्रारंभ से ही नौटंकीबाज़ होता है , ऊपर से तो नैतिक और अन्दर से चालाक शिकारी ,फिर हम ही अपने कुछ छोटे -छोटे स्वार्थों के चलते छुटभैयों को नेता बना देते है और फिर कहते है की नेता गलत है , भ्रष्टाचारी है, और हो क्यों न हम भी तो आतंरिक स्तर पर नेता ही है बस बात ये है की हमारे हाथ में भ्रष्टाचार करने की परिस्तिथि नहीं है |
                    भ्रष्टाचार का सम्बन्ध सदियों से है आज से नहीं, कितनी ही सरकारें आयीं सभी ने भ्रष्टाचार किया सवाल सिर्फ ये है की हम किस समय इसे देख पाने में सक्षम हो सके | आज फिर भी हालत वेहतर है, भ्रष्टाचार पूरी तरह से उजागर है , हर व्यक्ति अपनी बात कहने और आलोचना करने के लिए स्वतंत्र दिखाई देता है हम भ्रष्टाचार देख पा रहे है ये अच्छे लक्षण है , और कई सरकारों ने भी खूब भ्रष्टाचार किया और जनता को और मुद्दों  में उलझाये रखा |
                     देश में भ्रष्टाचार कम करने के लिए जरुरी है हमारे प्रारंभिक ढाचे जैसे की शिक्षा में बदलाव की जरुरत है | हमें जरुरत है की बचपन से ही बच्चों को सत्य के लिए लड़ना सिखाया जाये , उन्हें इतना समझदार बनाया जाये जिससे वे सच को वखुबी समझ सके ,और वेबजः के प्रलोभनों से दूर रहना सीख पायें , और इन सभी के लिए जरुरी है की हम खुद भ्रष्टाचार के मूल कारणों से बाकिफ हो और अपनी वेतुकी मान्यताओं से उबर सकें|
                      कानून बनाना अब तक किसी भी तरह अपराध को रोक पाने में सक्षम नहीं रहा है और तो और आदमी और ज्यादा चालाक बनकर सामने आया है , और फिर कानून तो बनाये ही जाते है तोड़ने के लिए |